रवि जी ने मेरे पहले लेख में कुछ कुछ रैगिंग लेने के अंदाज में पूछा
…. “चलिए हमें बताएं कि आप इस चिट्ठे पर हिन्दी में कैसे लिखते हैं, सरल तरीका क्या है और यदि आप लिनक्स में हिन्दी लिखने का कोई सरल तरीका बता सकते हैं तो बताएं ”. ये रैगिंग भी थी और शायद मेरी क्षमताओं को जानने की कोशिश भी.;-)
रवि जी भले ही मुझे ना जानते हों पर मैं उन्हें जानता हूँ,विभिन्न कंप्यूटर पत्रिकाओं में छ्पते उनके लेखों से. अभी इसी महीने “लिनक्स फॉर यू” में भी उनका लेख छ्पा है. उनका लिनक्स के हिन्दी-करण में भी काफी योगदान रहा है. तो वो यदि पूछें लिनक्स और हिन्दी के बारे में थोड़ा आश्चर्य होता है. ये सवाल तो मैने आपसे पूछ्ना है रवि जी. जहां तक मेरा सवाल है मैं बताता हूँ अपने बारे में (ज्ञानदत्त पाण्डे जी भी यही जानना चाहते हैं).
मेरा कंप्यूटर और हिन्दी से बहुत पुराना नाता है. मैं चिट्ठाजगत ( हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ) से अरसे से जुड़ा हुआ हूँ लेकिन सिर्फ एक पाठक की हैसियत से. इसलिये अधिकतर हिन्दी चिट्ठाकारों को इस माध्यम से जानता हूँ. जहां तक हिन्दी की बात है हिन्दी मेरी मातृभाषा है. कंप्यूटर पर हिन्दी की जरूरत मुझे पड़ी सन1996 में. तब मैं एक मैनुफेक्चरिंग कंपनी में काम करता था.वहां हम लोग मजदूरों के लिये ट्रेनिंग मैनुअल बनाते थे जो कि हिन्दी में होते थे.ये सब उन दिनों बाहर से टाइप करवाने पड़ते थे. इसमें एक तो समय बहुत लगता था और फिर एक बार बनने के बाद उनको बदलना बहुत मुश्किल होता था.हम चाहते थे कि इसको किसी तरह कंप्यूटर में ले के आना. उस समय माइक्रोसोफट वर्ड उतना प्रचलित नहीं था. हम लोग ‘एमि प्रो’ और ‘फ्री लांस ग्राफिक्स’ प्रयोग करते थे. उस समय किसी स्थानीय कंपनी से हमने कुछ सोफ्टवेयर लिया जो कि ‘रैमिंगटन क़ी बोर्ड’ पर चलता था. इसको इस्तेमाल करने मे काफी समस्या आती थी. अप्रेल 1998 (शायद) में "चिप" पत्रिका का पहला अंक आया था ( ये ‘चिप’ के ‘चिप-इंडिया’ बनने और ‘डिजिट’ के आने से काफी पहले की बात थी). उसमें भारत-भाषा के प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी दी गयी थी और साथ में सी.डी. में ‘शुषा’ फोंट भी थे.तब से ही मैं ‘शुषा’ फोंट का प्रयोग करने लगा. बाद में संस्थान के लिये ‘अक्षर’ और ‘श्री-लिपि’ भी खरीदे जो आज भी कुछ विभागों में सफलता पूर्वक चल रहे हैं. जहां तक अंतरजाल(वैब) पर हिन्दी की बात है तो मैने अपनी पहली हिन्दी साइट 1998 में बनायी थी. उस समय वी.एस.एन.एल के डायल अप ऐकाउंट होते थे और वो मुफ्त में सर्वर स्पेस देते थे जिसमें आप अपनी साइट होस्ट कर सकते थे. मैने पहली साइत उसी में बनायी थी जिसमें मैने हिन्दी लिखने के लिये ‘शुषा फोंट’ का प्रयोग किया था. यह साइट हमारे संस्थान के लोगों के लिये ही थी. मैने अपनी पर्सनल साइट 1999 में ‘एंजल फायर” में होस्ट की इसमें भी कुछ पेज हिन्दी के थे. फिर जियोसिटीज (www.geocities.com) में 2001 में अपनी साइट बनायी. उस समय जियोसिटीज (www.geocities.com) को याहू ने नहीं खरीदा था. उसी समय ई-ग्रुप्स में (जो कि अब याहू-ग्रुप है) अपना एक ग्रुप भी बनाया. मेरी साईट इसी ग्रुप की वेब साईट थी. इसमें भी काफी पेज हिन्दी में थे. लेकिन बाद में सदस्यों के कहने पर कुछ पेजों को ‘रोमनागरी’ में बदला,क्योकि शुषा फोंट वाले पेजों को देखने के लिये फोंट डाउनलोड करना पड़ता था, और कुछ को पी.डी.एफ. में बदला.ये साइट आधे-अधूरे रूप में आज भी मौजूद है.
जहां तक लिनक्स का सवाल है लिनक्स का प्रयोग भी खूब किया लेकिन इसका उपयोग अधिकतर सर्वर पर ही किया डैक्सटौप पर नहीं. हम लोग ‘HP-Ux’ और ‘AIX’ पर काम करते थे तो ‘युनिक्स’ पर हाथ साफ था. सारे सर्वर युनिक्स पर ही थे. लिनक्स को जाना पी.सी.क़्यू. लिनक्स के माध्यम से और एक दो बार विंडोज पार्टीशन करने के चक्कर में अपने कीमती डाटा भी खो दिये. लिनक्स को डैस्क्टोप में केवल प्रयोग के लिये ही इस्तेमाल किया और लगभग सभी फ्लेवर पर काम किया जैसे पी.सी.क़्यू. लिनक्स ,रैड हैट , सूसे , डैबियन, युबंटू और भी बहुत सारे. अपने संस्थान में लिनक्स को स्थापित किया. पूरा का पूरा मेल सिस्टम लिनक्स पर बदला.फायर-वाल के लिये पहले ‘चैक-पॉंईट’ और फिर ‘सूसे फायरवाल’ का प्रयोग किया, प्रोक्सी सर्वर के लिये ‘स्कविड’ का प्रयोग किया.ये सभी अभी भी मेरे पहले वाले संस्थान में सफलता पूर्वक चल रहे हैं.
जहां तक डैक्सटौप का सवाल है उसके लिये भी काफी प्रयास किया पर लिनक्स कभी भी मेरे पसंद का ओ.एस. नहीं बन पाया.वर्ड प्रोसेसिंग के लिये भी ‘मुक्त और मुफ्त’ विकल्प देखे. स्टार ऑफिस के व्यवसायिक होने से पहले उसे भी आजमाया और फिर ‘ओपन ऑफिस’ को भी. हाँलाकि मुझे तो ‘ओपन ऑफिस’ ठीक लगा पर मेरे संस्थान के लोगों के बीच यह नहीं चला. मुख्य कारण रही इसकी माइक्रोसौफ्ट वर्ड के साथ कम्पैटेबिलिटी. क्योकि अधिकतर लोग माइक्रोसौफ्ट वर्ड इस्तेमाल करते हैं और उनके द्वारा भेजी गयी सामग्री ओपन ऑफिस में कभी कभी नहीं खुलती थी.
जहां तक रही आजकल कम्प्यूटर पर मेरे हिन्दी लेखन की बात तो मैं आजकल मैं माइक्रोसौफ्ट विस्टा और ऑफिस-2007 इस्तेमाल करता हूं. मैने विस्टा में ‘हिन्दी भाषा पैक’ और ऑफिस के लिये ‘इंडिक आई.एम.ई.’ लगा रखा है. कभी कभी बराहा भी इस्तेमाल कर लेता हूं. लिनक्स में यदि कभी हिन्दी का इस्तेमाल करना हो तो ऑनलाईन टूल इस्तेमाल कर लेता हूं. लिनक्स में आजकल फैडोरा और स्लेड (सुसे लिनक्स इंटरप्राइज डैस्कटौप 10 ) इस्तेमाल करता हूं.
इस चिट्ठे में मैं उन तकनीकी विषयों को छूना चाहता हूं जो कि एक संस्थान के लिये आवश्यक हैं और जिनके बारे में अभी भी हिन्दी चिट्ठा जगत में चर्चा नहीं होती जैसे ई.आर.पी, फायरवाल, नैटवर्किंग वगैरह वगैरह. हिन्दी कैसे लिखें बताने के लिये पंकज भाई का वीडियो है, सर्वज्ञ है , श्रीस श्रीश जी हैं और भी बहुत लोग हैं और फिर रवि जी तो हैं ही.
अपनी तो कई खिड़कियॉं खुल गईं और कई तो बाकायदा उड़ गईं।
आओं बंधु…आओ और जम जाओ।
धन्यवाद. बहुत अच्छी जानकारी दी आपने. दरअसल हिन्दी लिखने के लिए अभी भी कोई आउट-ऑफ़ द बॉक्स समर्थन किसी भी प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं है और लिनक्स में तो और भी समस्या है. अभी हाल ही में एक हिन्दी लेखक जाकिर जी ने लिनक्स में हिन्दी कैसे लिखें पूछा था तो एकदम से बता पाना असंभव हो गया था क्योंकि हर सिस्टम के हिसाब से सेटिंग भिन्न हो सकती है. आपने सही कहा कि लिनक्स में हिन्दी लिखने के लिए एकदम सरल रूप अभी तो ऑनलाइन औजार ही हैं.
बहुत सही, इसी तरह के लेखन की जरुरत है। तकनीकी भी हो, लेकिन सामान्य बोलचाल की भाषा मे भी हो। इसी तरह के लेख, इन्टरनैट पर हिन्दी के लिए नए नए दरवाजे खोलेंगे।
मेरा एक सुझाव है, सभी चिट्ठाकार, अपने अपने शहर मे वैब पर हिन्दी से सम्बंधित यूजर ग्रुप बनाएं। लोगो को जागरुक करें और उन्हे इन्टरनैट पर हिन्दी ब्लॉग लिखने के लिए प्रेरित करें। हिन्दी पर जितने तरह के लोग आएंगे साथ मे उससे भी ज्यादा पाठक लाएंगे। पाठक आएंगे तो पीछे पीछे कम्पनियां और पत्रकार भी आएंगे।
इन्टरनैट पर हिन्दी को अभी बहुत सारा रास्ता तय करना है। सभी का बराबर साथ चाहिए।
हिन्दी में अनेकानेक तकनीकी विषयों पर चिट्ठे आरम्भ करने की महती आवश्यकता है। इसलिये आपके तकनीकी चिट्थे को पाकर बहुत खुशी हो रही है।
जीतु भाई का सुझाव भी बहुत उपयोगी है और कार्यान्वित करने में भी कठिन नहीं है। इसका भारी लाभ हो सकता है।
कमल जी आपके बारे में जानना दिलचस्प रहा। एक तो यह पता चला कि आपकी तकनीकी जानकारी बहुत अच्छी है दूसरा यह कि आप चिट्ठाजगत में काफी समय पढ़ने के बाद लेखन में कूदे हैं।
उम्मीद है आप सक्रिय रुप से लेखन के अलावा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में भी अपना योगदान देंगे।
श्रीस –> श्रीश
@रवि,
रवि जी अगर सिर्फ इंटरनेट की बात करें तो लिनक्स समेत सभी OS में हिन्दी लिखने का एक श्रेष्ठ टूल फायरफॉक्स Indic Input Extension है जिसके बारे में हाल ही में मैंने अपनी पोस्ट में बताया था।
कमल जी,
मेरे दिमाग की नसें हिल गईं। ऐसे-ऐसे तकनीकी टर्म हैं कि कुछ के बारे में सुना भी नहीं है। लेकिन आपमें निहित ऊर्जा से यह सुकून मिलता है कि आगे से सबकुछ पढ़ने को मिलेगा। मुझ, बेवकूफ की जानकारी बढ़ेगी। आपके बारे में पढ़ना सुखद रहा। आप कम्प्यूटर पर हिन्दी तबसे प्रयोग कर रहे हैं जब मैंने कम्प्यूटर नामक शब्द भी नहीं सुना था।
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